ये हम है ये हमारा डर है और अब हमे बेचने (Private) की साजिश हो रही है ।। - We Bankers

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Saturday, February 27, 2021

ये हम है ये हमारा डर है और अब हमे बेचने (Private) की साजिश हो रही है ।।



मैं बैंकर हूँ,

जी हाँ! नौकरी तो है लेकिन सुकून नहीं है

वेतन भी है लेकिन आम जरूरतों के लिए भी कभी पूरा नहीं पड़ा,

अधिकार भी है लेकिन सिर्फ कोरे कागजों पर काले अक्षरों में लिखे हुए,

परिवार भी है लेकिन कोसों दूर,

सुबह 10 बजे बैंक का गेट न खुले तो ग्राहक को अपना अधिकार और नियम कानून सब याद आ जाते हैं और ऊपर शिकायत करने से भी नहीं चूकता लेकिन उसी बैंक के अंदर से रात के 8 बजे भी बाहर आती हुई रोशनी उन ग्राहकों को नहीं दिखती कि कोई इतनी देर तक लगा हुआ है उसकी कोई शिकायत नहीं करता। बैंक में घुसते ही ग्राहक को अपने सारे अधिकार याद आ जाते हैं लेकिन किसी और सरकारी कार्यालय में आवाज़ उठाने की ताकत नहीं होती।

ग्रामीण शाखाओं पर धीमे काम होने पर हर ग्राहक काउंटर पर बैठे कर्मचारी को गुस्सा तो दिखा लेता है लेकिन ये नहीं सोचता कि उसे इंटरनेट की कितनी स्पीड मिल रही है उसे काम करने को। ग्रामीण शाखा में सुबह 10 बजे अगर कर्मचारी न पहुंचे तो गुस्से का शिकार होता है लेकिन रात के 9 बजे वो गाँव से वापस कैसे जाता है इसकी कोई फ़िक्र नहीं करता। इतने सब के बाद भी अगर शिकायत हो जाए तो हमेशा ग्राहक की सुनी जाती है क्योंकि ग्राहक तो भगवान है और बैंक का कर्मचारी नौकर। वो नौकर किस परिवेश और किस परिस्थितियों में काम कर रहा है वो कोई नहीं सोचता।

रिव्यु मीटिंग में कार्यपालकों से गाली सुनो और शाखा में ग्राहकों से। पैसों का लेन देन कोई काम नहीं माना जाता, काम माना जाता है तो थर्ड पार्टी बिजनेस, जो कि और कुछ नहीं बल्कि परजीवी हैं और बैंक को चूस चूस कर खोखला करते जा रहे हैं। जीवन बीमा, स्वास्थ्य बीमा करते करते बैंकर अपने जीवन को गर्त में धकेलता जा रहा है, SIP को RD और lumpsum को फिक्स्ड डिपाजिट बता कर बेच तो देता है लेकिन जब उसी ग्राहक को उतना मुनाफा नहीं मिलता तो सामने बैठा बैंकर ही गाली सुनता है और अगर झूठ बोल के ये स्कीम बेच ना पाए तो ऊपर बैठे अधिकारियों की गाली सुनता है।

अपना दर्द बताने पर जवाब मिलता है कि इन सब चीजों के लिए वेतन नहीं मिलता क्या? वेतन मिलता तो है लेकिन कितना मिलता है ये पूछा किसी ने? केंद्रीय सरकार का सबसे निम्न स्तर का कर्मचारी भी बैंक के अधिकारी से ज्यादा वेतन पाता है।

बैंकर के पास यूनियन तो है लेकिन उसका यूनियन बस उन्ही के काम आता है जो उनके चहेते हैं।

यूनियन में अंशदान तो समय से काट लिया जाता है, TDS भी समय से कटता है, आयकर भी समय से काट लिया जाता है लेकिन वेतन वृद्धि की बात आती है तो मिलता है केवल इंतज़ार। और तो और अपने अधिकारों के लिए हड़ताल भी नहीं कर सकता क्योंकि उसे हर हड़ताल के लिए उस दिन का वेतन कटवाना पड़ेगा। जी हाँ और कोई सरकारी कर्मचारी चाहे कितने दिन हड़ताल करें सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन बैंकर को हर हड़ताल के लिए अपने उस दिन के वेतन की क़ुरबानी देनी पड़ती है।

यूनियन के खिलाफ या ऊपरी प्रबंधन के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल सकता, स्थानांतरण का डर, निलंबन का डर।

ना जाने कब इस डर के आगे बढ़ेगा बैंकर, ना जाने कब अपनी आवाज़ को सो रही सरकार के कानों तक पहुंचा पायेगा, ना जाने कब अपने अधिकार के लिए आगे आ पायेगा और लड़ पायेगा इस व्यवस्था से।