मानो किसी ने बिना हाथ उठाये दोनो गालों पर करारा थप्पड़ जड़ दिया हो। मेरे ही एक बैंकर भाई को उसके घर से बेदखल कर दिया गया। वो जिसने निःस्वार्थ होकर सिर्फ अपनी ड्यूटी की, जिसने केवल अपने फ़र्ज़ को, अपने कर्म को तव्वजो दी, जो धर्म के रास्ते पे चला जिसने ऐसे महामारी के समय में भी बिना घबराये, बिना थके, बिना रुके अपना कार्य किया उसके साथ ऐसा दुर्व्यवहार, ऐसा घर-निकाला मानो अंदर कही चुभ गया हो।
क्या ग़लती है उसकी? ये की उसको Covid 19 हो गया या ये की उसने बैंक जॉइन कर लिया? या ये की वो ऐसे स्वार्थी लोगो के बीच जीवन व्यतीत कर रहा है? आज हमे भीतर देखने की ज़रूरत है। ये जान ने की ज़रूरत है कि हमारे बैंकर बन्धु के साथ ऐसा क्यों हुआ?
क्या उसके काम में कोई कमी रह गयी? बिल्कुल नहीं।
क्या उसकी नियत मैं कोई खोट थी? बिल्कुल नही।
क्या उसने किसी के साथ गलत किया? बिल्कुल नही।
फिर उसके साथ गलत क्यों हो रहा है?
सच तो ये है कि जिस क्षेत्र में वो काम कर रहा है वो अपने ही कर्मचारियों की इज़्ज़त करना नही जानता। वह उपभोक्ता को भरपूर प्यार, इज़्ज़त देने की जद्दोजहद में खुद अपने ही कर्मचारियों की छवि को धूमिल कर बैठा हैं। वह भूल गया हैं कि बैंक और उसके कमर्चारी समाज से जुडे हुए हैं और उन्होंने हर परिस्थिति में केवल अथक परिश्रम किया हैं। चाहे वो प्रधानमंत्री जी की कोई योजना हो या समाज के किसी भी दर्जे को ऊपर उठाने का कदम, वह हमेशा सरकार के साथ खड़ा रहा है। फिर आज जब लोगों ने उसका तिरस्कार किया, उसका अपमान किया, उससे ऐसे बेइज़्ज़त किया तो कहाँ है वो सरकार ? कहाँ है उसके बैंकर भाई, उसके वरिष्ठ अधिकारी, उसकी मैनेजमेंट?
उसे आज हमारी मदद की आवश्यकता हैं, हमारे साथ की, हमारे हाथ की, हमारी एकता की।
एक डॉक्टर के साथ मारपीट होने पर डॉक्टर की पूरी कम्यूनिटी स्ट्राइक पर चली जाती हैं, covid 19 की शुरुआत में जब उन्हें घर से निकाला गया तो सरकार ने उनके लिए होटल में रहने की व्यवस्था की, नया कानून बना दिया। इंसाफ़ की लड़ाई में उनकी कम्यूनिटी अंत तक लड़तीं है तो फिर हम क्यों उनसे कुछ सीख नहीं सकतें?
अंत में प्रश्न केवल एक है जो हम सबको अपने आप से पूछने की आवश्यकता है- क्या हम एक बार फिर हार जाएंगे?



