मैं एक बैंकर हूँ।
अपने पैतृक घर से 300 किलोमीटर दूर, अपने गृह जिले- गृह राज्य से बाहर। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव मे पदास्थापित हूँ।
मेरी गलती क्या है? ये कि मैं बैंकर हूँ या ये कि गृह जिले से बाहर पदास्थापित हूँ?
मेरे साथ छियालिश (46) साथियों ने नियुक्ति पायी थी, और सभी अपने गृह जिले से दूर कहीं अंजान शहर में पोस्टेड हैं। शहर क्या जी, गाँव मे पोस्टेड हैं। कुछेक तो ऐसे भाग्यशाली हैं कि उनका घर बनारस में है पर वो गोंडा में पोस्टेड है जबकि उनके साथी जो गोंडा के हैं वो बनारस में सेवा देते हैं। सेवा देते हैं पूरे साल, जनता को। सरकार के योजनाओं के क्रियान्वयन में अपनी जिंदगी के अनमोल क्षणों को मुस्कुरा कर, अपनी नियति मान कर आहुति दे देते हैं। जरूरत के समय हमें छुट्टी नहीं मिल पाती क्योंकि योजनाओं के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए एक डेडलाइन होती है, जो हमारे डेड हो जाने पर भी क्रॉस न हो जाये, इसका हमारे बड़े साहब प्रण लिए रहते हैं। हाँ, इसके बदले में वेतन मिलता है । पर वेतन तो सबको मिलता है। नेताओं को भी(पेंशन भी)। सरकारी कर्मियों को भी। सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग बना कर ससमय वेतन बढ़ा भी दिए जाते हैं और हमारे वेतन समझौते तो लटके हैं, पर सरकार को ये कभी नहीं दिखता है ।पर ये दिखता है कि हम उनके सपनों को पूरा करने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। कई योजनायें हैं, कई लाभार्थी हैं और हम सबके लिए माध्यम हैं। सभी लाभर्थियों को लाभ पहुँच जाता है, निःसंदेह हमारी बदौलत। आज सरकार अपने 56 इंच के सीने को ठोंकते हुए कह देती है कि हमने 5200 करोड़ रुपये गरीबों तक पहुंचाएं हैं, 15 करोड़ खाते खोले हैं, 1लाख करोड़ लोन 40 दिनों में बांटा है, तो बस हमारे बदौलत। वरना कंप्यूटर लाने वाले साहेब ने तो शर्म से सर झुका कर कहा था कि हमारे भेजे गए 1 रुपये में 10 पैसे ही गरीबों तक पहुंचते हैं।
एक घटना जो हमें विचलित कर रही है,
बांका,बिहार में कोरोना पीड़ित बैंकर परिवार (SBI) को कोलोनी वाले, पार्षद के बहकावे में घर खाली करने का दबाव बना रहे, मानसिक प्रताड़ना दे रहे। कुतर्क ये है कि अपना घर होता तो अलग बात होती, किराए का मकान है, ये लोग मुहल्ले में कोरोना फैला देंगे । पीड़ित अधिकारी को दुत्कारा गया और प्रताड़ित किया गया। जब उन्हें संबल की, सबके सहयोग की जरूरत थी तब उनका मनोबल तोड़ा गया है। मुझे एक बात तो समझ नहीं आयी है कि यार, वायरस को कैसे पता चलेगा कि संक्रमित किरायेदार है?? तो अब चारों तरफ फैलना है।मकान अपना होता तो संक्रमण मुहल्ले में नहीं फैलता।
और फिर उस बैंक अधिकारी ने संजीव कपुर के शो से अपने किचन में कोरोना वायरस नहीं बनाया होगा । बेचारे को संक्रमण किसी ग्राहक से ही आया होगा, सेवा देने के क्रम में, योजनाओं के क्रियान्वयन के प्रयास में।
सवाल है कि बैंक अधिकारी का अपना घर कहाँ होता है? अपने घर मे हम कब रह पाते हैं? हमें शुक्रवार को आदेश प्राप्त होता है और हम झोला उठा कर चल देते हैं सोमवार को दूसरे जगह जॉइन करने। हम जहां जाते हैं किरायेदार ही रह जाते हैं। कभी 6 महीने में कभी 1 साल में और ज्यादा से ज्यादा 3 साल में, हमें झोला उठाना ही पड़ता है। 30-35 साल के सर्विस में 12-15 ट्रांसफर तो होना ही है या उससे भी ज्यादा, इतने घर तो हम बना नहीं सकते तो हम किराएदार होने को ही सर्विस कंडीशन मान कर चलते हैं। ऐसे में कोरोना हो जाने पर हमें भगाया जाएगा तो हम कहाँ जाएंगे?? यही समाज हमें दुत्कार रहा है,हम जिसकी सेवा में लगे हैं। फौजी भाई छुट्टी लेकर घर जाते हैं, युद्धकाल में उनकी छुट्टी रद्द होती है और हमारी छुट्टियाँ तो रदद् ही रहती हैं। हर वर्ष लैप्स हो जाती हैं,हम हमेशा युद्धकाल ही झेलते रहते हैं । हमेशा टारगेट हमेशा डेडलाइन। हम जिसे सेवा देते हैं और फिर वही समाज हमें ऐसे ज़लील करेगा तो हमसे बदनसीब कौन है? हम नहीं कहते कि हमें सैनिकों जैसा सम्मान दो। पर अर्थव्यवस्था के सिपाही तो हम हैं, थोड़ा तो शर्म रखो अपने आँखों मे और थोड़ा सा सम्मान अपने मन में। कृतज्ञ होना इतना मुश्किल क्यों हो गया है?? हमारे इतने समर्पण के बाद भी आये दिन बैंकर्स के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आ रही है, बढ़ती जा रही है। तो क्या हम ये मान लें कि ये देश स्वार्थियों का देश है, कृतघ्नों का देश है ? अच्छा नहीं लगता है ऐसा बोलना, पीड़ा होती है हृदय में ऐसा सोच कर। पर स्थितियों और तथ्यों के सामने सच को कब तक नकारेंगे हम।
आखिर
हमारी गलती क्या है?
हम बैंकर हैं, ये? या हम घर से बाहर अंजान जगहों में कार्यरत हैं ये?
हम किरायेदार हैं, ये? हम शालीन हैं, ये?
या आपके आयोग्य होने पर हमने आपको लोन देने से मना कर दिया , ये?
या कि आप उसी परीक्षा में असफल होते रहे और हम सफल हो गए थे, ये??
अपने पैतृक घर से 300 किलोमीटर दूर, अपने गृह जिले- गृह राज्य से बाहर। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव मे पदास्थापित हूँ।
मेरी गलती क्या है? ये कि मैं बैंकर हूँ या ये कि गृह जिले से बाहर पदास्थापित हूँ?
मेरे साथ छियालिश (46) साथियों ने नियुक्ति पायी थी, और सभी अपने गृह जिले से दूर कहीं अंजान शहर में पोस्टेड हैं। शहर क्या जी, गाँव मे पोस्टेड हैं। कुछेक तो ऐसे भाग्यशाली हैं कि उनका घर बनारस में है पर वो गोंडा में पोस्टेड है जबकि उनके साथी जो गोंडा के हैं वो बनारस में सेवा देते हैं। सेवा देते हैं पूरे साल, जनता को। सरकार के योजनाओं के क्रियान्वयन में अपनी जिंदगी के अनमोल क्षणों को मुस्कुरा कर, अपनी नियति मान कर आहुति दे देते हैं। जरूरत के समय हमें छुट्टी नहीं मिल पाती क्योंकि योजनाओं के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए एक डेडलाइन होती है, जो हमारे डेड हो जाने पर भी क्रॉस न हो जाये, इसका हमारे बड़े साहब प्रण लिए रहते हैं। हाँ, इसके बदले में वेतन मिलता है । पर वेतन तो सबको मिलता है। नेताओं को भी(पेंशन भी)। सरकारी कर्मियों को भी। सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग बना कर ससमय वेतन बढ़ा भी दिए जाते हैं और हमारे वेतन समझौते तो लटके हैं, पर सरकार को ये कभी नहीं दिखता है ।पर ये दिखता है कि हम उनके सपनों को पूरा करने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। कई योजनायें हैं, कई लाभार्थी हैं और हम सबके लिए माध्यम हैं। सभी लाभर्थियों को लाभ पहुँच जाता है, निःसंदेह हमारी बदौलत। आज सरकार अपने 56 इंच के सीने को ठोंकते हुए कह देती है कि हमने 5200 करोड़ रुपये गरीबों तक पहुंचाएं हैं, 15 करोड़ खाते खोले हैं, 1लाख करोड़ लोन 40 दिनों में बांटा है, तो बस हमारे बदौलत। वरना कंप्यूटर लाने वाले साहेब ने तो शर्म से सर झुका कर कहा था कि हमारे भेजे गए 1 रुपये में 10 पैसे ही गरीबों तक पहुंचते हैं।
एक घटना जो हमें विचलित कर रही है,
बांका,बिहार में कोरोना पीड़ित बैंकर परिवार (SBI) को कोलोनी वाले, पार्षद के बहकावे में घर खाली करने का दबाव बना रहे, मानसिक प्रताड़ना दे रहे। कुतर्क ये है कि अपना घर होता तो अलग बात होती, किराए का मकान है, ये लोग मुहल्ले में कोरोना फैला देंगे । पीड़ित अधिकारी को दुत्कारा गया और प्रताड़ित किया गया। जब उन्हें संबल की, सबके सहयोग की जरूरत थी तब उनका मनोबल तोड़ा गया है। मुझे एक बात तो समझ नहीं आयी है कि यार, वायरस को कैसे पता चलेगा कि संक्रमित किरायेदार है?? तो अब चारों तरफ फैलना है।मकान अपना होता तो संक्रमण मुहल्ले में नहीं फैलता।
और फिर उस बैंक अधिकारी ने संजीव कपुर के शो से अपने किचन में कोरोना वायरस नहीं बनाया होगा । बेचारे को संक्रमण किसी ग्राहक से ही आया होगा, सेवा देने के क्रम में, योजनाओं के क्रियान्वयन के प्रयास में।
सवाल है कि बैंक अधिकारी का अपना घर कहाँ होता है? अपने घर मे हम कब रह पाते हैं? हमें शुक्रवार को आदेश प्राप्त होता है और हम झोला उठा कर चल देते हैं सोमवार को दूसरे जगह जॉइन करने। हम जहां जाते हैं किरायेदार ही रह जाते हैं। कभी 6 महीने में कभी 1 साल में और ज्यादा से ज्यादा 3 साल में, हमें झोला उठाना ही पड़ता है। 30-35 साल के सर्विस में 12-15 ट्रांसफर तो होना ही है या उससे भी ज्यादा, इतने घर तो हम बना नहीं सकते तो हम किराएदार होने को ही सर्विस कंडीशन मान कर चलते हैं। ऐसे में कोरोना हो जाने पर हमें भगाया जाएगा तो हम कहाँ जाएंगे?? यही समाज हमें दुत्कार रहा है,हम जिसकी सेवा में लगे हैं। फौजी भाई छुट्टी लेकर घर जाते हैं, युद्धकाल में उनकी छुट्टी रद्द होती है और हमारी छुट्टियाँ तो रदद् ही रहती हैं। हर वर्ष लैप्स हो जाती हैं,हम हमेशा युद्धकाल ही झेलते रहते हैं । हमेशा टारगेट हमेशा डेडलाइन। हम जिसे सेवा देते हैं और फिर वही समाज हमें ऐसे ज़लील करेगा तो हमसे बदनसीब कौन है? हम नहीं कहते कि हमें सैनिकों जैसा सम्मान दो। पर अर्थव्यवस्था के सिपाही तो हम हैं, थोड़ा तो शर्म रखो अपने आँखों मे और थोड़ा सा सम्मान अपने मन में। कृतज्ञ होना इतना मुश्किल क्यों हो गया है?? हमारे इतने समर्पण के बाद भी आये दिन बैंकर्स के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आ रही है, बढ़ती जा रही है। तो क्या हम ये मान लें कि ये देश स्वार्थियों का देश है, कृतघ्नों का देश है ? अच्छा नहीं लगता है ऐसा बोलना, पीड़ा होती है हृदय में ऐसा सोच कर। पर स्थितियों और तथ्यों के सामने सच को कब तक नकारेंगे हम।
आखिर
हमारी गलती क्या है?
हम बैंकर हैं, ये? या हम घर से बाहर अंजान जगहों में कार्यरत हैं ये?
हम किरायेदार हैं, ये? हम शालीन हैं, ये?
या आपके आयोग्य होने पर हमने आपको लोन देने से मना कर दिया , ये?
या कि आप उसी परीक्षा में असफल होते रहे और हम सफल हो गए थे, ये??


