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Friday, July 10, 2020

काम बढ़ने पर कर्मचारियों को कम करना किसी किताब में ये थ्योरी न मिले पर बैंको में लागू होता है ।।

*काम का बईमान-अंकगणित या नेगेटिव बैंककर्मी*

        अंकगणित के एकिक नियम में  कभी पढ़ा था......... "  किसी काम को  एक दिन में करने के लिए अगर पांच लोग लगते हैं तो ऐसे दो काम को एक दिन में करने के लिए दस लोग और  ऐसे तीन काम को एक दिन में समाप्त करने के लिए पंद्रह लोग लगेंगे।" इसी  अनुपातिक सिद्धांत में बढ़े काम के साथ  या तो काम करने वालों की संख्या बढ़ेगी या फिर कुल दिनों की संख्या।  पृथ्वी ग्रह के समस्त भूतल- जगत में यही गणित किसी काम के निपटारे के लिए अमल में लाया जाता है.....सिवाय भारत के सरकारी बैंको के।  यहाँ काम का परिमाण कितना भी अधिक बढ़ जाए....यहाँ न तो काम करने वालों की संख्या  बढ़ाई जाती है न दिनों की संख्या मगर यहाँ सब कुछ टकाटक और फटाफट चाहिए। .... कैसे?  तो किसी को मालूम नहीं। सिस्टम के पिरामिडी ढाँचे में सख्त फॉलोअप ऊपर से सरकता से हुआ रोज -रोज शाखाओं की कर्मियों पर जैसे फर्मान का सुबह -शाम कोड़ा लगाता है.....तो मास्क में जैसे  घुटन और घबराहट दुगुनी गति से  बढ़ जाती है।

कोरोना से परे सामान्य दिनों में भी बैंको में  काम के दवाब के आगे आत्महत्या को चुनने वाले की  लिस्ट बड़ी लम्बी है।  वर्तमान कोरोना संकट ने सुसाइड करने के मनोवैज्ञानिक  स्त्रोतों को और विस्तार दे दिया है।

सबसे बड़ी विडंबना है यही है कि आप बैंको में स्टॉफ
की कमी पर कोई बात नहीं कर सकते....जो  करते हैं... उनके लिए नेगेटिव शब्द का अविष्कार किया गया है।
ये ऐसा दर्शनशास्त्र है  जिस पर कुछ चंद अति महत्वकांक्षी  लोगों का दशकों से कब्ज़ा है। वो  एवेरेस्ट की फुलंगी पर पहुँचने के लिए आपको और आपके परिवार को सहजता से मरता देख सकते हैं।

बैंको  में कोरोना से शहीद होने और संक्रमित होने वाले की संख्या में जबरदस्त इजाफा हो रहा है। ये आंकड़े डराने वाले हैं और  जानबूझकर गोपनीय रखे गए हैं..
ताकि टार्गेट के अंतिम आंकड़ों  पर कोई साइड इफ़ेक्ट न पड़े। एक बैंक के मानव संसाधन विभाग में कार्यरत एक  उच्च अधिकारी ने नाम न जाहिर करने के शर्त पर बताया की  उनके लगभग 200 से अधिक स्टॉफ कल तक कोरोना पॉजिटिव थे और लगभग इतने ही अपने अंतिम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे थे। जबकि 17 से अधिक लोग  अब तक जान गँवा चुके थे। ये केवल एक बैंक का डाटा है..... सभी बैंको के आंकड़े को मिला दें तो मामला कई हजार में चल रहा है

स्वास्थ्य सम्बन्धी सभी आपातीय और विषम परिस्थितियों को नजरअंदाज करते सुबह से देर शाम तक नॉनस्टॉप रोज सैकड़ों की भीड़  निपटाने वाले आठ लोगों की एक छोटी बैंक शाखा में कल 2700 किसान ऋण के फाइल आए तो समस्त स्टाफ बंधुओं में जैसे हड़कंप मच गया। कब और कितने मिनट में हाथ धोना है.......मास्क कहाँ और कैसे लगाना है...  सब जैसे भेजे से विस्मृत होने लगा। कमोबेश यही हाल लगभग सम्पूर्ण  भारत के सरकारी बैंको का है।

बढ़ती आबादी और पसरती आर्थिक चुनौतियों  के नये बैकग्राउंड में नोटबंदी काल से ही काम का परिमाण भयानक और  अप्रत्यशित रूप से निरंतर  बढ़ रहा है जबकि स्टाफ की समुचित बहाली पर दीर्घ मौन- व्रत कायम है।

पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन बल से घूमती है तो भारत के सरकारी बैंक बैंककर्मियों के छाती पर शोषण -बल से।

ऐसे किसी एक ऋण  और कुल ऋण टारगेट को कम्पलीट करने में आइये जानते हैं... कुल कितना वक्त लग सकता है। 👇👇👇

* KYC जाँच और इंस्पेक्शन - KYC तो मिनटों में जाँच लेंगे.... मगर इंस्पेक्शन की प्रक्रिया को मोबाइल छूकर दफ्तर में बैठे पूरा नहीं कर सकते। कम से कम घर और खेत -खलिहान तो देखेंगे ही। वैसे नियम है तो आस -पास के स्थानीय लोगों से मार्केट रिपोर्ट संग्रहण का भी। इसे मटिया भी दे  तो कम से कम औसतन 1 घंटा का समय तो लगेगा ही।

* अगला स्टेप है 15-20 पृष्ठ के  आवेदन पत्र,  प्रपोजल और लिगल डॉक्यूमेंट को भरने का।  जो कस्टमर आपसे सालों तक पैसे निकालने की पर्ची भरवाता रहा हो.... आप इस जन्म तो भूल ही जाएँ वो आवेदन पत्र खुद भर कर जमा करेगा। इन सबको भरने में लगेंगे कम से कम एक घंटा।

*पर्सनल इंटरव्यू अर्थात कस्टमर से बातचीत, असेस्मेंट, वाउचर बनाना,  ऋण राशि का अंतिम रूप से वितरण.....इन सबमें  कम से कम एक घंटा तो लगेगा ही है।

* सारांशतः  एक लोन के निपटान  प्रक्रिया में  औसतन न्यूनतम 3 घंटे तो लगेंगे ही.... चाहे आप कितना भी उछल -कूद और तेज  दौड़ -भाग कर लीजिये।
सभी 2700 ऋण आवेदन के निपटान के लिए कुल 8100 घंटे लगेंगे।  अगर औसतन एक स्टॉफ भी सिर्फ और सिर्फ इसी कार्य के लिए लगा दिया जाय.. और रोज 12 घंटे कार्य करे .. तब भी कम से कम 675 घंटे अर्थात लगभग दो साल लगेंगे।
अगर दो स्टॉफ भी संलग्न होंगे तो न्यूनतम 1 साल।
मगर... कुछ भी हो  फर्मान यही है कि अगले महीने तक सारा काम ख़त्म हो जाय।  आप शॉर्टकट करेंगे तो गलतियाँ होंगी.. और . आपको दंड मिलेगा..... आप नहीं  करेंगे तो आपको जिल्ल्त और दंड दोनों मिलेगा।
इधर कुआँ उधर खाई..... बीच में आप और आपका परिवार.... और किनारे में मौज लेते टार्गेट की चंद  असवेंदनशीलताएँ।   वक्त आ गया है कि इस बौद्धिक अत्याचार में   सपरिवार चुपचाप  मरने के बजाय सत्य के लिए लड़ने को एकजूट रहे.... इससे पहले की काल अपने ग्रास  में सबको हजम कर ले।

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✍️***रामशंकर सिंह***✍️
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