प्राइवेट बैंक और सरकारी बैंक का सच - We Bankers

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Friday, May 10, 2019

प्राइवेट बैंक और सरकारी बैंक का सच

**मोदीवाद और PSU बैंकों के निजीकरण की साजिश** आज सुबह –सुबह एक टीवी चैनल की एक साल पुरानी वीडियो सहसा देखने को मिली/ वीडियो एक राष्ट्रिय चैनल की थी जिसमे एंकर और कुछ विशेषज्ञ -गण अमेरिकन अंग्रेजी में में खूब चीख-चिल्ला रहे थे /विषय था सरकारी बैंकों का क्यूँ न निजीकरण कर दिया जाय ..? स्टूडियो में धारा –प्रवाह अंग्रेजी में विषय-विश्लेषण करने वाले विद्वानों को खूब तालियाँ मिल रही थी /कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए एंकर ने सरकारी और प्राइवेट बैंकों के परफॉरमेंस की तुलना के लिए HDFC और SBI के आंकड़ों को स्क्रीन पर डाल दिया / आंकड़ों में बताया गया की SBI में कुल दो लाख उन्नासी हज़ार स्टाफ कार्यरत हैं , जबकि HDFC में चौरासी हज़ार तीन सो पचीस , जहाँ इस श्रम शक्ति के सहारे SBI में बीस लाख करोड़ से अधिक पब्लिक डिपाजिट का संग्रहण हुआ है वहीँ HDFC में लगभग साढ़े छह लाख करोड़ का / NPA अर्थात डूबे कर्ज के संदर्भ में बताया गया की SBI जहाँ एक लाख बारह हज़ार करोड़ का गच्चा खा चुकी है वहीँ HDFC यहाँ भी बेहतर स्थिति बरक़रार रखते हुए मात्र चार हज़ार इकतालीस करोड़ के नुकसान में है / लाभदेयता के सन्दर्भ में जहाँ SBI में प्रति कर्मचारी पांच लाख ग्यारह हज़ार का लाभ है हैं वहीँ HDFC में प्रति कर्मचारी पर लाभ 16 लाख करोड़ है एंकर ने आगे बताया की सरकारी बैंकों में बढ़ते घाटे और घटते लाभदेयता के समाधान के लिए फिक्की और अस्सोचाम ने निजीकरण का सुझाव भारत सरकार को दिया है / यहाँ यह ध्यात्व है की अक्सर समय-समय पर वर्तमान सरकार के वरिष्ट मंत्री बैंकों के निजीकरण के सन्दर्भ में अपरोक्ष बयान देते रहते हैं / इनकी लोमड़ी छाप सोच और दलाली विश्लेष्ण के हेराफेरी का जवाब मै प्रमाणिक आंकड़ों -तथ्यों से यहाँ लेख्यांकित करता हूँ ... • आंकड़ों के एकतरफा प्रस्तुतीकरण में ये दलाली मीडिया चालाकी से यह छुपा लेती है की सरकारी बैंकों यथा SBI में जहाँ 2 लाख उन्नासी हज़ार स्टाफ लगभग 45 करोड़ खाताधारकों को सेवा देती है वहीँ HDFC में 84,300 स्टाफ मात्र डेढ़ करोड़ ग्राहकों को सेवा देती है / इसे गणितीय अनुपात में बदले तो ज्ञात होता है की SBI में प्रति स्टाफ 1612 खातों के निरतंर देख-रेख और सेवा की जिम्मेदारी होती है जबकि HDFC में प्रति स्टाफ 177 खातों के देख-रेख की जिम्मेदारी होती है / अर्थात लगभग 10 गुना अधिक कार्यदाब एक SBI कर्मी HDFC कर्मी की तुलना में झेलता है / • SBI की 24,000 शाखाओं में आधे से अधिक गावों में केन्द्रित है और जबकि HDFC की 4963 शाखाओं में एक भी शाखा गावों के इलाके में देखे जाने की संभावना एलियनस की तरह अत्यंत दुर्लभ है / • जीरो बैलेंस खाते खोलना SBI की जहाँ प्राथमिकता और बाध्यता दोनों है वहीँ HDFC में खाते खोलने के लिए कम से पांच से दस हजार आपको प्रारम्भ में जमा करने ही पड़ेंगे / • बड़े पैमाने पे जीरो बैलेंस खाते बैंक के ऑपरेटिंग खर्चे को अधिक परिमाण से बढ़ा देते है साथ ही सरकारी बैंकों को बदले में थका देने वाली खचाखच भीड़ भी देते हैं / • ये उल्लेखनीय है की इस भीड़ से घबराकर मालदार और धनी ग्राहक/व्यवसायी समय के अभाव में सरकारी बैंकों से प्राइवेट बैंकों की तरफ रुख कर जाते हैं / जबकि प्राइवेट बैंकों के अधिक चार्जेज और खाता शुल्क से डरकर गरीबों की भीड़ वहां कभी दाखिल नहीं हो पाती , इससे शाखा में बहुत कम ग्राहक होत्ते हैं मगर जो भी होते हैं धन्ना सेठ और मालदार किस्म के होते हैं और उन्हें अच्छी सेवा भी आसानी से मिल पाती है / • अब विश्लेष्ण करते है लाभ और हानि के मूलाधारों की अर्थात NPA से जुड़े तथ्यों की :- 1. 24 जुलाई 2018 को केन्द्रीय वित्त विभाग ने प्रश्न संख्या 693 के जवाब में संसद में दबे आवाज में ये स्वीकार किया की महज 4387 अमीर लोगों के पास सरकरी बैंकों का कुल 8,59,532 करोड़ रुपया NPA के रूप में दबा हुआ है .....ये कुल ख़राब ऋण 10 लाख करोड़ का 84% है/ 10 करोड़ से हज़ार करोड़ रूपये तक वाले ये वो ऋण है जिन्हें कोई आम बैंकर ....कर्मचारी, अधिकारी या मेनेजर प्रदान नहीं करता है बल्कि ये सरकार के निर्देश और रिज़र्व बैंक के निगरानी पर पर बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स तय करते है की किसे लोन देना और किसे नहीं .......99.9 बैंकर्स की ऐसी किसी तथाकथित बड़े ऋण परियोजना में कोई रोल नहीं होता ......जब निहत्थे बैंकर इन पैसों को वसूलने के लिए अपने संप्रभु सरकार से मदद मांगती है तो सरकार मौन व्रत धारण कर लेती है .......बार -बार और हर बार डिफाल्टर्स बड़ी आसानी से एअरपोर्ट और फिर परदेश को रफ्फूचक्कर हो जाते हैं.....जाँच एजेंसियां, पुलिस, सेना , तोप टैंक लड़ाकू विमान , मिसाइल और एटम बम सब के सब स्टेचू हो जाते हैं......वहीँ स्टेचू जो हम बचपन में गेम के रूप में भी खेलते थे ....बहुत सारे आर्थिक-राजनितिक विश्लेषक यही मानते है की यह सब कॉर्पोरेट चंदे का घिनोना खेल है जो लम्बे समय से खेला जा रहा है और बदनामी का ठीकरा बाद में बैंकर पे फोड़ा जाता है ......राजनितिक पार्टियाँ इन्ही लुटेरों से लूट के पहले और बाद में अपना हिस्सा लेती है ठीक वैसे ही जैसे बॉलीवुड फिल्म में गुंडों से पुलिस हर लूट के बाद हफ्ता वसूलती है / 2. शेष के 14 % का एक बड़ा हिस्सा समाज और वोट कल्याण में प्रदत्त हुए हैं......जैसे कृषि ऋण, शिक्षा ऋण, लघु और मध्यम व्यवसायों के लिए ऋण जो की प्रारम्भ से ही सरकार द्वारा कंपल्सरी निश्चित किये हैं ...ये लोन नहीं बाँटने पर पेनल्टी और दुसरे सजा का प्रावधान भी है .......इसके अलावे चुनावों के ठीक पहले वोट प्रतिशत को बढ़ाने के लिए स्थानीय से राष्ट्रिय स्तर तक हर छोटे-बड़े नेता और सरकारी अफसर ऋण -बाँट के लिए डराने –धमकाने और भीड़ को उकसाने का काम करती है ......बैंकरों को लिए तब हालात इधर कूँआ उधर खाई वाली हो जाती है .....परन्तु ऋण देने के बाद जब यही खाता ख़राब हो जाता है तो यही नेता कुछ दलाल मीडियाकर्मियों के माध्यम से अपने गुनाह की कालिख बैंकरों के ऊपर पोत देते हैं........दलाली मीडिया और बिके हुए नेताओं का चरित्र चित्रण विजय माल्या के उस ट्विटर बयान से भी होती है जहाँ इस डिफाल्टर ने चेतवानी दी थी की ........वे मीडिया और नेता अपना मुंह बंद रखे जिन्होंने समय- समय पर हमसे भांति-भांति की सुख-सुविधाएँ ली हैं / 3. यह भी यहाँ उल्लेखनीय है की साल 2010 में बीजेपी के समर्थन और लार –प्यार से ही दारु बेचने वाला विलफुल डिफाल्टर विजय माल्या राज्य सभा का सदस्य बना था / हाल-फिलहाल में विजय माल्या और अरुण जेटली की विशेष मैत्रिक मुलाकात की चर्चा वायरल है / 4. हाल ही में पूर्व RBI गवर्नर ने अपने एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा किया की ....उन्होंने प्रधान मंत्री कार्यालय को कई-कई बार हाई प्रोफाइल NPA फ्रॉड के कई मामलों की लिखित शिकायत की थी पर उसपे कोई कारवाई नहीं की गयी ......क्यों....आखिर क्यूँ...??......क्या कमल छाप पार्टी इनके लिए कोमल छाप पार्टी बन गयी है / 5. इसी रिपोर्ट में उनहोंने यह भी भविष्यवाणी की है की राजनीती से प्रेरित और प्रभावित होकर जिस तरह नोट/चंदा (कॉर्पोरेट ऋण ) और वोट (कृषि ,मुद्रा ऋण ) के लिए धड़ल्ले से बड़े पैमाने पे लोन बांटे और माफ़ किये जा रहे हैं.......उससे एक दिन पुरे देश के अर्थव्यवस्था में सुनामी की आशंका प्रकट हो गयी है / राजनितिक भ्रष्टाचार और राजनीती में सस्ती लोकप्रियता के तत्व बैंकों के काल बनके उभरे है / 6. दावोस के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मलेन में नीरव मोदी और प्रधानमंत्री का एक फ्रेम में आना क्या महज संयोग है ? 7. चीन जैसे कई देशों ने अपने यहाँ विल्फुल डिफाल्टर्स पर लगाम लगाने के लिए उनके पासपोर्ट हमेशा के लिए जब्त कर लिए और उन्हें वायु और रेल सेवा से हमेशा के लिए वंचित कर दिया ....साथ ही कुछ दिनों या महीनो में उनकी पूरी सम्पति नीलाम कर दी ताकि बैंकों में जमा किया गया आम नागरिकों का पैसा बैंकों में सुरक्षित लौट आये / भारत में इन तरीके को लागू करने में क्या परेशानिया हैं .....यही न की अपनों का दर्द अपनों से देखा नहीं जाता / 8. ऋण वसूली में भारत के विश्व में रैंकिंग 102 देशों के बाद आता है / अमेरिका और जापान जैसे देश जहाँ 6 महीने में 90 % उधार की बसूली कर लेते हैं वही भारत में 5 सालों तक में 25 % तक भी नहीं हो पाता / इस विशाल अंतर के पीछे है राजनितिक चरित्र का स्तर / 9. एक रिपोर्ट के मुताबिक 80 फीसदी नेताओं के सम्पति/ दौलत में इजाफा ज्यामिति विधि से भी अधिक गति से हुआ है / इसका खुलासा दो विभिन्न चुनाओं में दिए गये आय सम्बंधित हलफनामे से हुआ / आखिर कैसे ???? इस गरीब देश विकास के ऐसे त्वरित तकनीक की आवश्यकता है /देश हित में इसे सार्वजनिक कर देना चाहिए / 10. इसका जवाब कौन देगा की नोटबंदी के दौरान किस प्रयोजन से अधिकांश नए नोट RBI के द्वारा प्राइवेट बैंक में डाले गये जबकि कई –कई गुना भीड़ सरकारी बैंकों के आगे लाइन लगा के खड़ी थी ......बाद में नोटबंदी का 99 फीसदी हेराफेरी इसी प्राइवेट चैनल से संपन्न हुआ किसी की मेमोरी कमजोर पड़ गयी हो तो गूगल और यू-टयूब देख ले / 11 .क्रिमनल ओफेंस के लगभग प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मामले में सर्वप्रथम इंटरपोल रेड कार्नर नोटिस जारी करती है ताकि के दुसरे देशों में रह रहे अपराधियों को उसके देश सौंप दिया जाए ......विलफुल डिफाल्टर्स जैसे भगोड़े को क्रिमनल ओफेंस में वर्गीकृत करना सरकार के बाएं हाथ का खेल है .....मगर दुर्भाग्य है की इस सन्दर्भ में महज लफ्फाजी और नौटंकी हुई है / नोट बंदी के महान योजना में आर्थिक रूप से शहीद हुए एक केशियर ने बताया की उन्हें नकदी की कमी के वजह से लगभग 3 लाख तक ऋण लेकर भरपाई करनी पड़ी ....पैसो के किल्लत के वजह से न बहन की शादी हुई न ही पिता का ठीक से इलाज...(जो बाद में चल बसे).....उलटे बच्चों को प्राइवेट स्कूल से नाम कटवा कर गावं के सरकारी विद्यालय में डालना पड़ा / बदले में क्या मिला .....ने वेतन वृद्धि न सम्मान न प्रशंसा प्रशस्ति.... उल्टा सभी बैंकर को इस NPA के लिए चोर कहा जाने लगा/ किसी का पाप किसी और के माथे ढालने का पुरजोर प्रयास किया ताकि बैंकर अपने जायज वेतन वृद्धि की मांग को भूलकर काले पानी के गुलाम मजदूरों की तरह बीमार और मर जाने तक काम करते रहे / जैसे छोटा बिमारी छोटा डॉक्टर होता है वैसे ही बड़ी बिमारी के लिए बड़ा डॉक्टर होता है ......NPA के केस में बड़ा डॉक्टर अर्थात भारत सरकार अन्य देशों के सरकारों से उलट प्राम्भ से ही हमेशा मौन व्रत के परमान्द अवस्था में रही / सरकार अपने टैक्स वसूली में जिस इच्छाशक्ति का प्रयोग करती है उसका चार आना भी इन अमीर लूटेरों को पकड़ने में करती तो संभवतः ऐसी दुर्दिन स्थिति आती भी नहीं / देश के आबादी थमने का नाम नहीं ले रही है ....133 करोड़ के इस विशाल देश में सरकार की सभी आर्थिक –सामाजिक योजनाओं में 98 फीसदी से अधिक बैंकर रात-दिन और हॉलिडे –वोर्किंग डे का भेद मिटा कर काम कर रहे हैं.....यही सोच कर की कभी मुगाम्बो खुश होगा .....और बढ़ते मंहगाई के दौर में उचित वेतन वृद्धि की कृपा होगी/ जैसे PM जी को इस देश की चिंता है ठीक वैसे ही एक बैंकर को भी ऑफिस के बाद अपने बच्चों –परिवारों की चिंता रहती है / बढ़ते निजीकरण के प्रभाव से शिक्षा , चिकित्सा , भोजन और आवास सभी भयानक रूप से मंहगे हुए है / अत्यधिक विपरीत परिस्थियाँ ईमानदारी को वर्चुअल और सैधांतिक बना देती है और सिस्टम पर अपना दूरगामी प्रभाव छोडती है वहीँ अत्यधिक दौलत भी मनुष्य को चारित्रिक और नैतिक कंगाल / आवश्यकता है की शीघ्र अतिशीघ्र इस गगनचुंबी NPA को लुटेरे कॉर्पोरेटस से सरकार द्वारा सख्ती से वसूल किया जाय और बैंकों, बैंककर्मियों और 100 करोड़ ग्राहकों की आर्थिक रक्षा सुनिश्चित की जाय तभी असल में संतुलन कायम होगा और राष्ट्र की रक्षा होगी...और हाँ इस गरीबों के मुल्क में सरकारी बैंकों के निजीकरण की सोचना लोकतंत्र और गरीबों के विनाश के बारे में सोचना ही है ....इसलिए इसे भूल कर भी अपने खोपड़ी में न रखे /
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