कराहता बैंककर्मी : रोता गणतंत्र :मरती संवेदनाये - We Bankers

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Friday, January 25, 2019

कराहता बैंककर्मी : रोता गणतंत्र :मरती संवेदनाये


     हाल ही में एक बैंक मेनेजर द्वारा प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक छुट्टी के आवेदन दिए जाने की घटना ने मीडिया को एक सनसनीखेज खबर दे दी / इस निवेदन पत्र में उक्त प्रबंधक अपनी बीमार पत्नी को जान से मारने और दाह -संस्कार करने के लिए सिर्फ 2 दिन की छुट्टी चाह रहा था / ध्यातव्य हो की उक्त प्रबंधक पिछले कई सालों से अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए विभाग से अवकाश नहीं प्राप्त कर पा रहा था ..और अपनी इसी विवशता के कारण उसे उक्त पत्र लिखने के लिए बाध्य होना पढ़ा / हालाँकि भारतीय बैंकों में छुट्टी के लिए प्रताड़ना का यह कोई सबसे बड़ा या जघन्य उदाहरणों में से नहीं है जिसे गिनीज बुक या नोबल में स्थान मिले .....असंख्य ऐसे मामले हैं जहाँ पीड़ित पृथ्वी लोक के बड़े यमराजों से इतने थर्राए रहते हैं की अप्रत्यक्षतः अपने परिवार , बीवी -बच्चों को ही कष्ट देते हैं, मरने देते हैं ...लेकिन कभी मीडिया से मुखातिब नहीं हो पाते / सब बातों की एक बात ....की बात इतनी सी है की देश की आबादी ज्यामितीय तरीके से भीषण रूप ले रही है और यहाँ NPA व मर्जर के नाम पर नयी भर्तियों के बजाय सरकार उल्टा स्टाफ की कटौती को अग्रसर है / परिणामस्वरूप काम का दवाब लगान फिल्म की तरह तिगुने लगान जैसा भारी भरकम हो गया है और "छुट्टी" एक दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजाति की तरह सचमुच अप्राप्य और अघटित / फिल्मों की कहानी से इतर एक आम बैंक कर्मी अंतिम गेंद में यहाँ छक्का नहीं लगाता बल्कि क्लीन बोल्ड होता है ....क्यूंकि इस खेल में बैट -बॉल ,विकेट , नॉन स्ट्राइकर , दर्शक सब विरोधियों के साथ ही हो लेते हैं ....और एक आम बैंक कर्मी कुछ घंटा नहीं उखाड़ नहीं पाता /
सबकी कहानी एक ही है ....."बैंक घाटे में है ".......सरकार अपने सत्ता मोह में जो स्क्रिप्ट लिखती है....दलाली मीडिया उसे ही आकर्षक अंदाज में परोसती है ...दिखाती है , .बाद में धीरे-धीरे भोली-भाली मतदाता को लगने लगता है की आम बैंक कर्मी ही स्वयं इस समस्या के लिए दोषी है , सियासी चाल शकुनी से भी तेज सोचती हैं .....परिणामस्वरूप बैंकों में मानव संसाधन के मानवीय पहलु महज किताबी तथ्यों तक सीमित रह जाता है और शोषण विडियो गेम की तरह नए लेवल को क्रॉस कर चूका होता है / मैं सरकार को इस मामलात इसलिए वैचारिक कटघरे में खड़ा कर रहा हूँ...क्यूंकि दवाब का पिरामीडिय केन्द्र शुरू में बहुतायत वहीँ से शुरू होता है/ योजनाओं के निर्माण, संपादन और क्रियान्वन में सबसे पहले काम की मात्रा, जनसँख्या समीकरण और उपलब्ध श्रम शक्ति का जायजा लिया जाता है / कम सैन्य टुकड़ियों से चलचित्रों में ही दुश्मन के पराक्रम को निस्तेज करना संभव होता है .....यथार्थ जिन्दगी में ऐसा करना आमतौर पर असंभव या अत्यंत जेखिम भरा होता है / एक आंकड़े के मुताबिक भारत के अलग-अलग न्यायालयों में 5 करोड़ से अधिक सुनवाई विलंबित है और कई दशक से अंतिम फैसले का इंतजार आज भी अपेक्षित है / यही हाल दुसरे विभागों का भी है जहाँ एक काम के लिए कितने चप्पल ख़रीदे जाते हैं और भागदौड़ की रगड़-पेंच पे सब घिष जाते हैं.....भारत के सरकारी बैंक इन सभी विभागों से कार्य -जिम्मेदारियों के निपटान में अधिक सक्षम और बेहतर रही है और बैंकिंग काम -काज सामान्य रूप से डेली बेसिस ही निबटाया जाता है ....चाहे काम की मात्रा कितनी भी अधिक क्यूँ न हो .... फिर भी वोट और नोट के दो पाटों में बैंक कर्मियों को पीसते हुए देखना राजनितिक सत्ता के लिए अधिक लाभदायी और मनोरंजकीय विकल्प होता है / आपके मगजमारी के लिए थोड़ी सी बाते और रखता हूँ ..
एक आंकड़े के मुताबिक राष्टीय अपेक्षा औसतीय गणित में यही कहती है की प्रति 5000 की आबादी पर एक बैंक हो मगर सच्चाई यही है की प्रति 25000 आबादी पर भी एक बैंक नहीं है , बैंकों में होने वाले ऑडिट रिपोर्ट कहती है की प्रति स्टाफ कार्य दवाब या क्षमता में दुगुने से अधिक का इजाफा हुआ है , फिर भी बैंक घाटे में है का विधवा विलाप सरकार करती है ....न छुट्टी मिलता है न वेतन बढ़ता है , शाखा प्रबंधकों का तो और बुरा हाल है .... फिर तो यही अपेक्षा की जाती है की वो बीमार होने पर ही छुट्टी लेगा .....उसके लिए बिना पूर्व सुचना के बीमार पड़ना भी परम आदेश और अनुशासन का उलंघन माना जाता है / काला पूंजीवाद जो वास्कोडिगामा के बाद यूरोप से भारत अवतरित हुआ था ऐसा लगता है की अंग्रेजों के जाने के बाद भी यहीं काबिज रहा और वो भी और अधिक प्रबलता से / 26 जनवरी के परेड में थल , जल , वायु और सभी तरह की सामर्थ्यताओं का विशाल प्रदर्शन लोकतंत्र को आत्मविश्वास देने-दिलाने के लिए होता है और आगे भी होता रहेगा , पर तब तक ये गणतंत्र और संविधान की सफलता का जमीनी सच नहीं बन सकते जब तक की अरबों-खरबों रूपये के काले धन और कॉर्पोरेट डिफाल्टर्स से बैंक के पैसे नहीं वसूल किये जाते / चंद अमीरों -पूंजीपतियों को बैकडोर लाभ देने के लिए लाखों बैंककर्मियों के प्राकृतिक अधिकारों का गला नहीं घोटा जा सकता है / 99 फीसदी बैंक कर्मियों की बड़े कॉर्पोरेट ऋण वितरण में कोई भूमिका नहीं रही है ....इसकी वसूली सरकार के बाएं हाथ के बाएं नाख़ून से संभव है लेकिन समस्या ये है की उनके पास ऐसे किसी इच्छा शक्ति का घोर अभाव है / विद्वान और लेखक श्री वेद माथुर कहतें है की सरकारे कॉर्पोरेट चंदे के लालच में बड़े पूंजीपतियों को ऋण देय और ऋण माफ़ी का खेल खेलती है और इस सियासी दावं का सबसे बड़ा शिकार आम बैंक कर्मी होतें हैं / वर्तमान मे केंद्र सरकार की लगभग हर योजना के क्रियान्वन का भार आम बैंक कर्मियों पर डाला गया है पर बढे काम के बदले अगर कुछ मिला है तो वो है जिल्लत, गाली, छुट्टी के लिए भीषण संघर्ष ,वेतन समझौतें में सालों की देरी और ब्रहमांड का सबसे घटिया पेंशन व्यवस्था NPS अर्थात न्यू पेंशन स्कीम .....
सरकार पर निजीकरण के इंद्रजाल का आलम ये रहा है की प्राइवेट स्कूल , हॉस्पिटल में अब आम आदमी जाने से कतराता है ,.....अब बारी जीरो बैलेंस खाता खोलने वाली भारत के सरकारी बैंकों की है जहाँ मर्जर और निजीकरण की गुप-चुप साजिश चल रही है /.......चौकस हों और जागते रहें 
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