वी बैंकर्स का 4 वर्ष का सफर अनुभव और सीख - We Bankers

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Friday, January 11, 2019

वी बैंकर्स का 4 वर्ष का सफर अनुभव और सीख

बैंक कर्मियों के समक्ष चुनौती वेतन, पेंसन और कार्यदिवस के मामले में समता और बराबरी हांसिल करने की या फिर वेतन आयोग के दायरे में आने की -एक चिन्तन, मनन और बहस सही सोच और सही रास्ता निर्धारित करने की दिशा में :

जब हम बात करते हैं समता और बराबरी की या फिर वेतन आयोग में शामिल होने की तब हमारे सामने तीन पक्ष उभर के आते हैं -आईबीए, यूएफ़बीयू और सरकार । अब इन तीनों पक्षकारों में से कौन सबसे ज़्यादा बाधक है इस समता और बराबरी की राह में पहले उसे तय किया जाना है क्योंकि जब तक वह बाधा दूर नहीं होगी -मंज़िल मिलना दुष्कर और दुरूह है । वी बैंकर्स ने अपने चार साल के संघर्ष के दौरान इस दिशा में अनुभव प्राप्त किए हैं -इन अनुभवों का सार कुछ इस तरह है :

(1) सरकार -अधिकांश लोगों का मानना है कि इन तीन पक्षकारों में सबसे सशक्त सरकार है-यदि सरकार राज़ी हो जाए तो काम आसान हो जाए । वी बैंकर्स ने 13 सितम्बर 2014 को जन्तर मंतर पर प्रदर्शन किया और वित्त मंत्री को सम्बोधित ज्ञापन दिया । फिर 2 नवम्बर 2014 को जन्तर मंतर पर प्रदर्शन किया और दिल्ली पुलिस की देख रेख में प्रधानमंत्री जी के आवास पर उनकी अनुपस्थिति में उनके ओएसडी को ज्ञापन दिया । प्रधानमंत्री मोदी जी के जन्म दिन पर उन्हें लगभग 7500 बैंक कर्मियों द्वारा हस्ताक्षरित ऑनलाइन याचिका सौंपी । 29 दिसम्बर 2014 को विभिन्न आँकड़ों के माध्यम से अपनी माँग को जायज़ प्रमाणित करते हुए विस्तृत ज्ञापन सौंपा । यानि सरकार के मामले में वह सब किया जिसे किए जाने के लिए विद्वान बैंक कर्मियों ने सुझाव दिए थे । क्या नतीजा निकला और क्या अनुभव मिला ?

प्रधानमन्त्री कार्यालय से वी बैंकर्स को संक्षिप्त जवाब मिला वह यह कि प्रधानमंत्री कार्यालय में ऐसे मामलों में केवल पंजीकृत यूनीयन ही ज्ञापन दे सकती है, क्योंकि वी बैंकर्स एक पंजीकृत यूनियन नहीं है इसलिए उसके ज्ञापन पर विचार करना सम्भव नहीं है । सरकार ने संसद और न्यायपालिका के समक्ष बार बार कहा कि बैंकिंग उद्योग में वेतन और पेंसन का निर्धारण समस्त प्रमुख यूनियनों और IBA के मध्य वार्ता और समझौते के ज़रिए होता है और इस मामले में सरकार का हस्तक्षेप नहीं है ।

अब ये अनुभव और ज्ञान मिल जाने के बाद यक्ष प्रश्न यह है कि सरकार के ख़िलाफ़ आन्दोलन करके क्या उसके रूख या दृष्टिकोण में बदलाव लाया जा सकता है ? सरकार हर प्रदर्शन या न्यायालय में लगाई गयी हर याचिका पर यही कहते हुए अपना पल्लू झाड़ लेगी -सरकार के इस कथन का हमारे पास क्या तोड़ है ? जब तक वह तोड़ न मिल जाए बार बार सरकार के ख़िलाफ़ आन्दोलन करने और वही रटा रटाया जवाब पाने से क्या हांसिल होगा ? यह सोचे जाने और इस पर बहस किए जाने की ज़रूरत है ।

(2) आईबीए : IBA नियोक्ता बैंकों की एसोसिएशन है जो इन बैंकों से मिले मैंडेट के आधार पर वेतन,पेंसन और अन्य सेवा शर्तों पर सभी प्रमुख यूनियनों से वार्ता करती है और समझौता करती है जो सभी बैंकों और यूनियनों व उनके सदस्यों पर बाध्यकारी होता है -यह समझौता बाक़ायदा औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 18 के अंतर्गत पंजीकृत करवाया जाता है और इस धारा के प्रावधान के अनुसार ऐसा समझौता उन लोगों पर भी लागू होगा जो समझौते के पक्षकार नहीं हैं, जिन्होंने समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और ऐसे समझौते को वैधानिक चुनौती नहीं दी जा सकती । अब जब यह वैधानिक स्थिति पता चल गई तो यह ज्ञान भी प्राप्त हो गया कि समझौता होने के बाद लड़ाई कोई लड़ाई नहीं होती -ऐसी लड़ाई क़ानून की जटिलता में फँस जाती है । ख़ुद IBA की मौजूदा वैधानिक स्थिति यह है कि वह एक पंजीकृत संस्था नहीं है और इस लिहाज़ से औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत वैध समझौते की पात्र नहीं हैं ।भारतीय संविदा अधिनियम के तहत ग़ैर पंजीकृत संस्था वैध समझौता नहीं कर सकती -इसके अतिरिक्त Banking Regulation Act व Companies Act के प्रावधानों के अंतर्गत भी आईबीए के समझौता करने के अधिकार व पात्रता को चुनौती दी जा सकती है । अब यक्ष प्रश्न यह है कि यदि वी बैंकर्स आईबीए के समझौता करने के अधिकार और पात्रता को न्यायालय में चुनौती दे और न्यायालय वी बैंकर्स की दलीलों को स्वीकार करते हुए आईबीए को समझौता करने से प्रतिबंधित कर दे यानि वी बैंकर्स जीत जाय तब क्या स्थिति उभरेगी ? क़ानूनी स्थिति यह है कि समझौता नियोक्ता और कर्मकारों के बीच होना चाहिए यानि तब यह स्थिति उभर सकती है कि समझौता नियोक्ता बैंक के स्तर पर वहाँ की बहुमत प्राप्त यूनियन से होने लगे यानि अलग अलग बैंकों में अलग अलग वेतनमान -क्या इससे बैंक कर्मियों की एकता तार तार नहीं हो जाएगी ? क्या ऐसा क़दम उठाना बुद्धिमत्ता होगी ? इस पर चिन्तन मनन और बहस किए जाने की ज़रूरत है ।

(3) यूएफ़बीयू : यूएफ़बीयू बैंक कर्मियों और अधिकारियों की नौ प्रमुख यूनियनों का साझा संघठन है । आईबीए की तरह यूएफ़बीयू भी पंजीकृत श्रमिक संघ नहीं है । जहाँ आईबीए अपनी सदस्य बैंकों से मैंडेट लेती है वहीं यूएफ़बीयू बैंक कर्मियों से कोई मैंडेट नहीं लेती । इसकी घटक यूनियनें परिपत्र निकाल कर माँग पत्र बनाने के लिए सदस्यों से सुझाव आमंत्रित करती हैं और उन सुझावों को अंगीकार करते हुए अपनी अपनी यूनियन का माँग-पत्र यूएफ़बीयू को सौंप देती हैं -फिर सभी यूनियनों के शीर्ष नेता इस प्रकार प्राप्त हुए माँगपत्रों पर विचार कर एक साझा माँग पत्र हस्ताक्षरित कर आईबीए को सौंप देते हैं जो अलग अलग यूनियनों द्वारा अपने अपने सदस्यों को प्रसारित कर दिया जाता है ।अब इसी साझा माँग-पत्र पर वार्ता होनी होती है । IBA अपनी सभी सदस्य बैंकों की बैलेन्सशीट को मिलाकर एक बैलेन्सशीट बनाकर यूएफ़बीयू को सौंप देती है-यानि यह बता देती है कि समस्त बैंकों का कितना लाभ है और उस लाभ में से कितना वह वेतन और पेंसन में बढ़ोत्तरी के लिए प्रयोग में ला सकती है । अब शुरू होता है वार्ताओं का दौर -इन वार्ताओं के दौर के दौरान आईबीए के विशेषज्ञ सौंपे गए साझा माँग पत्र में से किस माँग को मान लेने पर कितनी लागत आएगी -यह गड़ना कर आँकड़ों का आदान प्रदान करते रहते हैं -अब क्यूँकि यूएफ़बीयू ने भुगतान क्षमता को सिद्धान्त रूप से स्वीकार किया हुआ है और वार्ता सामूहिक सौदागिरी के सिद्धांत पर होती है तो सब कुछ आँकड़ों की बाज़ीगरी पर चलता है -यूएफ़बीयू के नेता यह गड़ना करते हैं कि किस मद में कितनी बढ़ोत्तरी से अधिकतम फ़ायदा हो सकता है तो आईबीए यह गड़ना करती है कि कैसे आँकड़ों के आधार पर कम से कम देना पड़े - जहाँ दोनों पक्ष राज़ी हो जाते हैं वहाँ उतने पर समझौता हो जाता है ।

तो अब उपरोक्त मौजूदा व्यवस्था को समझने के बाद वी बैंकर्स को निष्कर्ष निकालना है कि आख़िर वह क्या करे -किसके ऊपर दवाब बनाए ताकि समता और बराबरी का लक्ष्य हांसिल हो सके । हम लोगों ने 2014 में इस बारे में ख़ूब चिन्तन और मनन किया था-फिर मेरा यह सुझाव सबने माना था कि आईबीए की तरह यूएफ़बीयू भी बैंक कर्मियों से मैंडेट ले -हमारी यही माँग होनी चाहिए ।तब इस माँग पर मैंने एक औद्योगिक विवाद तैयार किया था जिसे गणपति सुब्रमण्यम समेत उस वक़्त के सभी वी बैंकर्स के अग्रिम पंक्ति के लोगों ने जाँचा और परखा था -साधारण सुधार के बाद हम लोग एकमत हो गए थे और हमारी केवल दो माँगे थीं :

(1) बैंक कर्मियों के मध्य गुप्त मतदान के ज़रिए जनमत सर्वेक्षण करवाया जाय कि वे मौजूदा भुगतान क्षमता पर आधारित व्यवस्था चाहते हैं या फिर वेतन आयोग ।

(2) सेवानिवृत्त नेताओं का एक बैंककर्मी के रूप में क़रार सेवा निवृत्त वाले दिन समाप्त हो गया इसलिए वे यूनियन विधान के अनुसार यूनियन के साधारण सदस्य नहीं रह गए और जब सदस्य नहीं रह गए तो पदाधिकारी भी नहीं रह गए -इसलिए सेवानिवृत्त नेताओं को सेवारत कर्मचारियों की ओर से वार्ता करने और समझौता करने से प्रतिबन्धित किया जाय ।

वी बैंकर्स ने यह औद्योगिक विवाद 23 जनवरी 2015 को मुख्यश्रमायुक्त (केंद्रीय) दिल्ली के समक्ष दायर किया । मुख्य श्रमायुक्त ने वी बैंकर्स का कानपुर का पता देख यह मामला उपमुख्य श्रमायुक्त कानपुर को सौंपा । यूएफ़बीयू नेताओं के दवाब के चलते तीन माह तक इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं हुई -श्रममंत्रालय के ऊपर दवाब बना कर कार्यवाही शुरू करवाई गई । 5 मई 2015 को उपमुख्य श्रमायुक्त ने यह कहते हुए हस्तक्षेप से इंकार कर दिया कि वी बैंकर्स एक पंजीकृत यूनियन नहीं है इसलिए औद्योगिक विवाद दायर नहीं कर सकती । हमने उपश्रमायुक्त के निर्णय को इलाहबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी -न्यायालय ने हमारी दलीलों को स्वीकार करते हुए 18 मई 2015 को अपने आदेश के ज़रिए उपमुख्य श्रमायुक्त को निर्देश दिए कि वह छः माह में हमारे औद्योगिक विवाद का निबटारा करें -आदेश की प्रति आईबीए और यूएफ़बीयू को भेजी गई -हाहाकार मच गया -उपमुख्यश्रमायुक्त को साध लिया गया और जल्दबाज़ी में एक हफ़्ते में 25 मई 2015 को समझौता कर लिया गया । वी बैंकर्स ने तुरन्त समझौते में पेंसन कम होने को आधार बनाते हुए समझौते को चुनौती दी और समझौता हस्ताक्षरित होने के तीसरे दिन यानि 28 मई 2015 को यह आदेश पारित करवा लिया कि कोई भी समझौता याचिका के निर्णय के अधीन होगा । उपमुख्य श्रमायुक्त ने उच्च न्यायालय के निर्देश का पालन नहीं किया -दिसम्बर 2015 में वी बैंकर्स ने उनके ख़िलाफ़ ज़ोरदार प्रदर्शन किया -जब सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की तब 2016 फ़रवरी में उच्च-न्यायालय की अवमानना का वाद दाख़िल कर दिया गया । सारे दुश्मन एक हो गए-मार्च 2016 में यूएफ़बीयू के दो बड़े घटकों ने हमारे प्रदर्शन में मैनज्मेंट की शह पर उत्पात मचा पहले निलम्बित करवाया और फिर सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले बर्खास्त । इस संघर्ष को थोड़ा विराम लग गया ।

पूरे प्रकरण में यूएफ़बीयू के नेताओं के इशारों पर नाचने वाले उपमुख्यश्रमायुक्त को हम लोगों ने वी बैंकर्स की ताक़त का अहसास करवा दिया है -उनके ख़िलाफ़ भृष्टाचार का मामला पंजीकृत करवाया-जाँच करवाई और उन्हें अपने पद से दो पद नीचे वाली स्थिति में स्थानांतरित करवा दिया है ।

इस बीच सर्वश्री सारांश श्रीवास्तव, आशीष मिश्रा और राहुल मिश्रा उच्चतम न्यायालय के एक नामी गरामी वक़ील से मंत्रणा कर आए -उस मंत्रणा के आधार पर हम लोगों के इलाहबाद उच्च न्यायालय में नवम्बर 2018 में एक और याचिका दायर की -दुर्भाग्य से हनें सफलता नहीं मिल सकी ।

संक्षेप में मौजूदा व्यवस्था से उभरी चुनौतियों और वी बैंकर्स द्वारा अभी तक किए गए प्रयासों को इस पोस्ट में इसलिए रेखांकित किया है ताकि वी बैंकर्स से जुड़े अग्रिम पंक्ति के लोग व वी बैंकर्स से जुड़े बैंक कर्मी इस पर चिन्तन मनन और सार्थक बहस के ज़रिए इसके उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उचित मार्ग तलाश सकें ।

आभार
कमलेश चतुर्वेदी
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