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Tuesday, August 4, 2020

एक ईमानदार व्यक्ति गरीब हो सकता है पर धोखेबाज नही ।।

ग़रीबी की औकात
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#Dedicated_to_all_banker_CORONA_WORRIERS



बात तब की हैं, जब मेरी नियुक्ति, सरकारी बैंक की ग्रामीण शाखा में ,तहसील मुसाफिरखाना ,ज़िला अमेठी में थी ।
रोज़ की तरह मैं अपने काउंटर पर था ,जिसपे मैं सरकारी जमा निकासी, 2लाख से ऊपर के लेन देन व पेंशन भुगतान करता था।
 कुछ 4  या 5 तारीख थी,पहले 10 दिन बहुत भीड़ होती थी पेंशन धारकों की, दिन भर मैंने अपने खिलंदड़ी स्वभाव के अनुसार ग्राहकों से हँसी मज़ाक करते हुए काम किया ।शाम को 4 बजे के बाद जब कैश का मिलान किया तो उसमें 4000 रुपए कम थे,कैश को 2, 3 बार चेक किया ।सारे वाउचर, cbs से दोबारा मिलाये ,तो पता चला एक नगद निकासी का वाउचर पोस्ट नही हुआ था ,एकाउंट की इन्क्वारी की तो देखा खाते में तो पैसा ही नही था, किसी देव नारायण का था शायद ।

फिर cbs से उसके घर का पता देख कर, अपने कैन्टीन बॉय राम पदारथ के साथ उसके घर गए रात के 8 बज रहे थे ।घर पे उसका बेटा रमेश मिला उसको जब बात बताई तो वो बोला साब पैसे तो हमने खरच दिए। ", "कहाँ खर्च दिए ?क्यों ख़र्च दिए ? " गुस्से में मैंने पूछा, तो वो कुछ बोला नही बल्कि अपने खेत पे लगे ट्यूब वेल के पर ले गया ।वहाँ ट्यूब वेल की कोठरी में एक चारपाई पे एक बुजुर्ग लेते थे ,एकदम दधीचि अस्थियां थी निर्बल, सांस लेने में भी हाफ़ रहे थे, पेशाब के लिए नली लगी थी और ग्लूकोज़ चढ़ रहा था पास एक छोटा बालक बैठा था।रमेश ने कहा "साब, पिताजी कै बुढ़वा पेन्सिन आवत हैं वही निकारे रहे, अब तौ सब खरच गए दवा दारू मा, बलिके 800 कम परी गये दावा मा ,मालूम होइत कै पेन्सिन नही आई हैं तौ ना आइत बैंकिया,साब अब् तौ पैस्वा नाइ हैं जब होहिये तो दैई देब "।
हम थोड़े स्वभाव से इमोशन टाइप के है, तो ये सब देख सुन कर गला तो थोड़ा भर आया, फिर बनावटी कड़क आवाज़ में कहा "ठीक है ,ठीक हैं दे देना .......सुनो ये 1000 रुपये रख लो सुबह दवाई ले आना " इतना कह के हम लौट आये ।
फिर 4000 rs अपनी जेब से भर के हमने कैश बंद किया,और ये मान चुके थे कि ये पैसे हमे नही मिलेंगे ,चलो किसी बुजुर्ग की दवा के काम आए।फिर ये बात हम बिल्कुल भूल चुके थे
लगभग 1 साल बाद उसका लड़का मेरे पास बैंक में मेरे काउंटर पे बिना लाइन के आया ,उसे देख के हमने कहा "चलो लाइन में लगो ,देखो सब बुढ्ढे लोग लाइन में है और तुम साइड से आ रहे हो "
"साब कोन्हों काम नही है  बस आप कै पैसा दे आये हैं "कह के 5000 रुपये उसने मेरी ओर बढ़ा दिए ।
मैं उसे देख के बस ये सोच रहा था कि इसे याद था,जबकि मैं भूल चुका था
"और अब पिता जी कैसे हैं "मैंने पूछा

"6 महीने पहिले गुजर गए , मुला मरत समय कहे रहे कि बाबूजी का पैसा लौटायो ज़रूर। साब आप अगर 1000 रुपिया और न दिए होते तो वो तो अगिले दिन ही मर जाते ।
अब जुटाए पायेन है,और आज हमार बिटेवा का जन्मदिन है बाज़ार आये थे तौ आपो का पैसा लै आईन हैं ।" रमेश ने जवाब दिया ।

अब मुझे समझ ही नही आ रहा था कि कैसे प्रतिकिया दूँ ?
5 मिनट में लंच होने वाला था।मैंने उसे लंच टाइम तक रोका फिर उसके साथ बाहर एक कपड़े की दुकान, जो ब्रांच के सामने थी, वहाँ गया उस छोटी बच्ची से पूछा कौन सी ड्रेस चाहिए, वो मेरा मुँह ताकने लगी ,रमेश "अरे रहै देओ साब हम तौ 100 ,200 की औकात वाले हैं "
"तुम्हे तुम्हारी औकात नही पता दद्दू , तुम्हारी औकात सेठ लोगो से ज्यादा हैं" ऐसा कहते हुए उस बच्ची की  मनपसंद ड्रेस निकलवाई और उसे दे दी और रमेश को जाने को बोल दिया ।
दुकानवाला रोज़ ही  बैंक आता था तो वो मुझसे बोला "अभिषेक सर देनी ही थी तो सस्ती मद्दी दे देते ,इतनी मंहगी ड्रेस दे दी ,आपने  देखा नही कितने मैले कपड़े थे दोनो के ,ये ड्रेस भी दो दिन में कूड़ा हो जाएगी"

"हाँ, तन से जरूर वो गंदे थे ,पर मन से ,वो मुझसे और तुमसे ज्यादा साफ है,और हमारी औकात से ऊपर भी " इतना कह के मैं वापिस बैंक की ओर बढ़ चला और वो दुकानदार अवाक सा मुझे देखता रहा
✍️Abhishek kumar
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