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Wednesday, December 19, 2018

हर बार बैंक वालो को ही विलेन का किरदार क्यो निभाना पड़ता है




मेरी पहली फ़ोटो का शीर्षक है- 99 प्रतिशत वस्तुएं 18 फीसदी gst के दायरे में

और दूसरी फ़ोटो में - सेल्फ चेक से अधिकतम निकासी 50000

https://youtu.be/BayYHsz1h1o

एक आम आदमी दोनों न्यूज़ देखने के बाद किसको हीरो बताएगी और किसको विलेन , ये शायद बताने की जरूरत नही ।।।

निसंदेह दूसरी खबर के बारे में जानकर बैंक वालो से लोग नफरत करने लगेंगे ,
क्यो, आखिर क्यों ???

हर बार बैंक वालो के सीने को ही क्यो छलनी किया जाता है ऊपर से ये मीडिया वाले इस तरीके से न्यूज़ बोलते है जैसे लगता है बैंक में कर्मचारी नही गुलाम वंश के लोगो को रखना चाहिए और बैंक माने सभी सुविधा फ्री फ्री फ्री फ्री फ्री में ...

ग्राहक तो बैंक वालो से ही आकर लड़ता है डायरेक्ट, नोटबन्दी में याद होगा ही आप लोगो को किस तरह नोटो की किल्लत और उसकी जानकारी ग्राहकों को होने के बाद आये दिन झड़प होती ही रहती थी , मेरा पैसा है मुझे चाहिए चाहे जहाँ से दो क्यो नही दोगे, अभी FIR कराता हूं, लिख कर दो की पैसे नही दोगे ऐसे तमाम वाकये का सामना हर बैंकर को करना पड़ा होगा ।।

और ग्राहकों की नजर में बैंकर बेबस होने के बावजूद सब कुछ सुनने के बाद देशसेवा (नोटबन्दी) के काम मे तन मन धन, दिन रात लगे रहे , वो बात अलग है उस टाइम का ओवरटाइम भी अभी तक किसी को नही मिला ।।

मुद्दा ये है कि इतने सारे नियम, इतनी लिमिट के ऊपर सरचार्ज , इतना ही कैश लेने की छूट उससे ऊपर पर परमिशन या फिर सरचार्ज ... चलो ठीक है कि बैंक (सरकार) को कैश कम करके ऑनलाइन ट्रांसक्शन पर ज्यादा जोर देना है पर क्या आज जो हालात है अभी जहाँ 10 से 15% ही ऑनलाइन होते है, 90% की उम्मीद करना सही है , पोलियो के लिए भी 5 साल से ऊपर अभियान चलाया गया तब कही जाकर आज वो खत्म है और उसको भी बच्चन साहब ने प्रमोट किया,
क्या ऑनलाइन, UPI के लिए जागरूकता अभियान समय समय पर चलाने की आवश्यक्ता नहीं, क्या लोगो को नुक्कड़ नाटक के माध्यम से इसके फायदे बताने की जरूरत नही, क्या पहले खुद के ट्रांसक्शन कैश ना करके ऑनलाईन करने की जरूरत नहीं ।।

सीधी बात है मोटापा कम करने वाले को पहले उसके मोटापा कम करने के फायदे बताओगे कि पहले बिना कुछ बताये उसका खाना खाना ही बंद करवा दोगे ।।

आपको और सबको पता है रेलवे में ऑनलाइन रिज़र्वेशन कराने पर भी सर्विस चार्ज देना पड़ता है,
बिजली के बिल में भी किलोवाट के अनुसार कुछ फिक्स्ड अमाउंट अतिरिक्त देना ही पड़ता है
होटल के बिल्स, रेस्टोरेंट के बिल में भी अतिरिक्त देना ही पड़ता है
हवाई टिकट, बस हर जगह तो कुछ ना कुछ अतिरिक्त देना ही पड़ता है ।

फिर एक बैंक अगर सर्विस दे रहा और मामूली चार्ज ले रहा है तो इतना दर्द क्यो हो रहा मीडिया वालों को, ऊपर के डिपार्टमेंट के बारे में तो कभी स्पेशल रिपोर्ट बनाया हो देखा नही मैंने कभी, ऊपर से इसी वीडियो में ये बोलना की बैंक में
May I help you
काउंटर के पास जाने से भी लोग डरेंगे इसका क्या मतलब ,
क्या ये बैंक के साथ सरकार और मीडिया की जिम्मेदारी नही की वो बताये की ये चार्जेज क्यो लिए जा रहे हैं, क्या बैंक माने फ्री फ्री फ्री होता है ।। इस समय जहाँ एक तरफ किसानों का कर्ज माफ और बड़े बकायदारों से वसूली करनी चाहिए उसकी जगह इस तरह के फैसले से जनता के सामने यही संदेश जाता है बैंक अब ऋण माफी की भरपाई हम आम आदमियों से पैसे ले कर करेगी , और ज्यादातर लोग तो यही सोचेंगे कि बैंक वाले पहले लोन में अब इस तरह के चार्जेज ले कर आम ग्राहकों पर जुल्म ढा रहे हैं, जबकि सबको पता है कि कोई भी चार्जेज किसी बैंकर की जेब मे नही डायरेक्ट कमीशन एकाउंट में क्रेडिट होता है, पर हम आप को तो सुनना ऐसे पड़ता है जैसे ये सब ना हो तो दिन का लंच भी ना मिले हमे( कोई मेरी बात से इत्तेफाक ना रखे तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखे)

फिलहाल मुझे तो यही समझ मे आता है जो कमजोर हो उसी को लोग और दबाते है, बैंक प्रबंधन प्रॉफिटेबल संस्था होने के बावजूद अपना भरोसा खोती जा रही है, एक सज्जन ने बहुत पहले ही मुझे कहा था धीरे धीरे सरकारी बैंक को लॉस मेकिंग और निठल्ला साबित कर दिया जाएगा और ये तब ही मुझे यकीन हो गया था जब मार्किट में जिओ का सिम लांच हुआ था ।।

अब बात बैंक की तो ये बीच मे जिओ का फ्री सिम और इंटरनेट कहा से आ गया , चलिए इस पर भी प्रकाश डालने की कोशिश करते है ,

आज से 10 साल पहले bsnl का इंटरनेट हुआ करता था शायद 99 रूपया में , धीरे धीरे प्राइवेट कंपनियां bsnl का ही स्पेक्ट्रम इश्तेमाल करके इंटरनेट देने लगी और ज्यादा नही बस 4 साल पहले 350 में 1 gb इंटरनेट 28 दिन के लिए वो भी 3g,
मतलब इंटरनेट बहुत कॉस्टली था उस जमाने मे

मार्किट किसी दूसरे के लिए तैयार कर के रखी गयी थी कि कोई दूसरा आये और बस हथिया ले , नतीजा जिओ का इंटरनेट डेली 4GB वो भी एक साल फ्री
सब कंपनियों के होश उड़ गए और वो भी 399 में 78 GB और 4G नेटवर्क के साथ

मतलब ऐसा क्या हुआ जो  1 gb 399 वाली कंपनी 399 में daily 1 GB और 4G स्पीड देने लगी, ये था मार्किट से गायब होने का डर, इस डर में उन्होंने लॉस पर बिज़नेस भी किया या अपने फायदे को कम किया लेकिन जिओ की तो मार्किट बन गयी, क्या 10 साल पहले जब 99 में था इंटरनेट तब वो हिम्मत कर सकता था , जवाब है नही ।।

कुछ इसी तरह सरकारी बैंक को भी किया जा रहा है, इसे लॉस मेकिंग और सबकी नजरों में नकारा साबित करके इसको प्राइवेट वालो के सामने खड़ा कर दिया जाएगा की लगाओ बोली और मार्किट वैल्यू डाउन होने से कम दाम में उनको एक बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर वाला बैंक आधे पौने दाम में मिल जाएगा ।। अब जाहिर सी बात है प्राइवेट कुछ दिन तक ही अच्छा लगेगा पर जब तक ग्राहक कुछ समझ पाएंगे तब तक बहुत देर हो गयी होगी ।।

आपकी राय आमंत्रित है कमेंट बॉक्स में

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