विश्वव्यापी जानलेवा कोरोना की संक्रामक बीमारी के दौरान हुए सरकार द्वारा देश व्यापी लॉकडाउन ने बैंक कर्मियों को सच्चाई और यथार्थ से परिचित करवाया है-इस सच्चाई को सोशल मीडिया पर एक युवा ने व्यंग्यात्मक लहजे में बैंक कर्मियों की तुलना “मन्दिर के घण्टे” से करते हुए उद्घाटित किया है -“मन्दिर का घण्टा” मतलब जिसका जब मन करे आए और बजा कर चला जाए । अब ज़रा इन दो अलग अलग घटनाओं के बारे में सोचें और विचार करें कि सरकार ने या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रबन्धन ने शाखा प्रबंधकों को ऐसे कौन से अधिकार और उस अधिकार के अनुपालन हेतु कौन सी शक्तियाँ दी हैं जिनका उपयोग वह ग्राहकों और आम जनता पर कर सकता है ? अधिकांश शाखाओं में गार्ड नहीं हैं, पर्याप्त संख्या में स्टाफ़ नहीं है-यह जानते हुए भी प्रधानमंत्री की राहत योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु छोटी-छोटी सहायता राशि का भुगतान उदगम के स्थल पर नियंत्रण रखने वाले सरकारी विभागों के कर्मचारियों के ज़रिए जिनके लिए सहायता राशि भेजी गई है, उनके गली मोहल्लों में जा कर उनके निवास पर देने की जगह यह ज़िम्मेदारी बैंकों के ऊपर डाल कर पहले बैंकों में भीड़ लगवाने का निर्णय लिया गया और अब जिनकी यह ज़िम्मेदारी है कि वे सरकार के सोशल डिसटेंसिंग के निर्देशों का पालन करवाएँ-ऐसे अधिकारी भी अब इसकी ज़िम्मेदारी भी बैंक पर डाल रहे हैं-सरकारी अधिकारियों द्वारा शाखा प्रबंधकों को दिए गए ये पत्र इसका प्रमाण हैं ।लॉकडाउन की इस अवधि में यह भी साबित हो गया है बैंक कर्मी बहुत दुर्भाग्यशाली हैं, जिन संघठनों को वे प्रतिमाह एक निश्चित धनराशि देते हैं, जिनके आवाहन पर प्रदर्शन में भाग लेते हैं, हड़ताल करते हैं, वे नदारद हैं, उनके नेता नेपथ्य में चले गए हैं, बहुत हुआ तो पत्र लिख कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रहे हैं, यह काम तो उनसे कई गुना बेहतर तरीक़े से वी बैंकर्स ने जिसके पास अभी ज़मीन पर पर्याप्त संख्या नहीं है-उसने कर दिखाया है सोशल मीडिया, यूट्यूबऔर ट्विटर पर बैंक कर्मियों की आवाज़ को ज़ोरदार और प्रभावशाली तरीक़े से लगातार उठा कर ।
ऐसी परिस्थितियों में शाखा प्रबंधकों को क्या करना चाहिए ? पहला काम तो ये कि सरकारी अधिकारियों द्वारा उनके समकक्ष शाखा प्रबंधकों को दिए गए इन पत्रों का प्रिंटआउट ले कर सम्भाल के रख लेना चाहिए - दूसरा काम अपने अपने उच्च अधिकारियों को इन पत्रों की कापी लगा कर सूचित करें कि जिन परिस्थितियों के लिए सरकारी अधिकारियों ने शाखा प्रबंधकों को दोषी ठहराया है वे परिस्थितियाँ आपकी शाखा में भी हैं-इसलिए किसी भी सरकारी अधिकारी द्वारा इस तरह का पत्र निकाला जा सकता है जिससे बैंक की छवि को नुक़सान पहुँच सकता है, फिर उच्च अधिकारियों को निम्न उपायों की सलाह देते हुए इसके अनुमानित ख़र्चों के भुगतान हेतु आपको अनुमति देने का अनुरोध करें :
1) ब्रांच के बाहर पचास कुर्सियों की एक लाइन और पचास कुर्सियों की दूसरी लाइन कोरोना से बचने के लिए निर्देशित कम से कम एक मीटर के फ़ासले पर लगवानी पड़ेगी
2) ग्राहकों को धूप से बचाने के लिए कनात भी लगवाने पड़ेंगे ।
3) पीनेके लिए ठंडा पानी ,हल्का फुल्का नाश्ता की व्यवस्था और सैनेटाइजर की एक से अधिक बोतलें भी रखनी पड़ेंगी ।
उपरोक्त के अलावा यह हमेशा ध्यान रखें :
- किसी भी ग्राहक को कोई तकलीफ़ न हो,ब्रांच स्टाफ समय-समय पर जा कर बाहर बैठे लोगों से मधुर आवाज में , इसकी जानकारी ले।
- ध्यान रखें आप बैंकर हैं, आप ही के मजबूत कंधों पर देश की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। आप देश के आर्थिक सिपाही हैं और गाहे बगाहे प्रधानमंत्री और वित्तमन्त्री आपकी तारीफ़ कर देंगे ।
- इमोशनल बैंकिंग करने के बाद आपको हमेशा की तरह लेट घर जाना है।
- ध्यान रखें किसी भी सरकारी कर्मचारी और बैंक कर्मचारी में सदैव अंतर होता है-सरकार केवल सरकुलर निकाल कर “Equivalence of Post” का सिद्धान्त विकसित कर अपने अधिकारी के बराबर आपको बता देती है लेकिन वेतन उससे आधा देती है ।
- सरकारी अधिकारियों के साथ उनकी यूनियन भी होती है जो केवल शानदार अंग्रेज़ी में पत्र और सरकुलर नहीं निकालती बल्कि साथ खड़ी दिखाई देती है ।
- इन बातों पर ध्यान दें वरना केवल और केवल आप हमेशा की तरह जिम्मेदार ठहराए जाते रहेंगे।।




