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Tuesday, April 28, 2020

पंजाब नैशनल बैंक में किस तरह कर्मचारी हितों की अनदेखी की जाती है

पंजाब नैशनल बैंक में किस तरह कर्मचारी हितों की अनदेखी की जाती है-किस तरह कर्मचारियों के हितैषी होने का दावा करने वाले मैनज्मेंट से मिल कर कर्मचारियों का अहित करते हैं -उसकी एक और बानगी प्रस्तुत है ।

ये सच्ची कहानी है बैंक में कार्यरत कैंटीन कर्मियों की -जी हाँ उन्हीं कैंटीन कर्मियों की जो सबेरे शाखा का तुला खुलने से देर शाम तक शाखा बन्द होने तक पूरी शाखा के कर्मचारियों को चाय पिलाते हैं, उनके खाने का बंदोबस्त करते हैं और बदले में मात्र 100 रुपए प्रति कर्मचारी की दर से पारिश्रमिक पाते हैं -किसी तरह की कोई छुट्टी नहीं, कोई बोनस नहीं, कोई प्रॉविडेंट फंड नहीं किसी तरह की कोई सुविधा नहीं । श्रमिक आंदोलनों की पावन धरती कोलकाता के जाँबाज़ और बहादुर साथियों ने 1995 में एक ऐतिहासिक संघर्ष की शुरुआत की - कैंटीन कर्मियों को बैंक कर्मियों का दर्जा दिए जाने की । इन लोगों ने इण्डियन ओवर्सीज़ बैंक, भारतीय जीवन बीमा निगम, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया आदि के कैंटीन कर्मियों का हवाला देते हुए इन्हें भी उन्हीं के सामान बैंक कर्मी का दर्जा दिए जाने की माँग की । 12 साल की लम्बी लड़ाई के बाद माननीय कोलकाता उच्च न्यायालय के एकल जज ने इनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया । इस फ़ैसले को बैंक ने डिवीजन बेंच में चुनौती दी जहां फिर हार का सामना करना पड़ा । मैनज्मेंट इस मामले को उच्चतम न्यायालय ले गया और स्थगनदेश प्राप्त कर लिया - लम्बे संघर्ष के बाद 25 सितम्बर 2018 ये कर्मचारी उच्चतम न्यायालय से भी जीत गए - भले आदेश वैसा नहीं आया जिसकी आशा थी - देखें आदेश ।

कोलकाता के बहादुर, दिलेर और जाँबाज़ साथियों का यह 23 साल लम्बा संघर्ष क़ानून की पुस्तकों में दर्ज हो गया है -इस शानदार संघर्ष के लिए इन साथियों को सलाम -इनके संघर्ष की तारीफ़ करने के लिए शब्द नहीं हैं - इन्होंने महँगे से महँगे वकील खड़े करने और हर तरह से सुसज्जित ताक़तवर मैनज्मेंट को लगातार हराया है - इन 23 सालों में इन्हें कितनी परेशानी, कितने झझवातों का सामना करना पड़ा होगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती -कई साथी तो जीत देखे बिना ही दुनिया से चले गए होंगे ।

जब ये साथी संघर्ष कर रहे थे तब हमारी यूनियन क्या कर रही थी ? 2007 में जब ये साथी उच्च न्यायालय से जीते थे तब क्या यूनियन का फ़र्ज़ नहीं था कि वह इन साथियों की लड़ाई को पूरे देश भर के कैंटीन कर्मियों का संघर्ष मानते हुए उन्हें बैंक कर्मी का दर्जा दिए जाने की माँग पर संघर्ष करती ? बैंक जब उच्चतम न्यायालय में मामला ले कर गई तब क्या बैंक के मुक़ाबले का नामी गिरामी वकील खड़ा करने की ज़िम्मेदारी कर्मचारियों के हितैषी होने का दावा करने वालों की नहीं थी ?

23 साल के लम्बे संघर्ष के बाद उच्चतम न्यायालय के आदेश के ज़रिए जो लाभ 29 कैंटीन कर्मियों को मिले हैं -उन लाभों को बैंक के समस्त बैंक कर्मियों को दिलवाने की ज़िम्मेदारी किसकी है ? कैंटीन सब्सीडी को रुपए 60 प्रति कर्मचारी जो कि 1998 में निर्धारित हुई थी उसे 2017 में रुपए 100 प्रति कर्मचारी निर्धारित करवा देना ऐतिहासिक उपलब्धि और सफलता है क्या ?

यूनियन के नेता की मात्र एक विशेषता होती है और वह यह कि दूसरे के दुःख में दुःखी हो जाना -अपने आप को उस दुखी के स्थान पर रख उसकी पीड़ा का अनुभव करना और फिर उसके दुःख, उसकी पीड़ा के निवारण के लिए हर सम्भव जतन करना, संघर्ष करना । दूसरों के विरोध में अपनी ऊर्जा और शक्ति लगाने वाले इन नेताओं को आज आत्म विवेचन करने की ज़रूरत हैं, घमंड से बाहर निकल कर अपनी आत्मा में झांकने की ज़रूरत हैं और खुद से यह सवाल करने की भी ज़रूरत है कि क्या वह यूनियन नेता की कसौटी पर कहीं से भी किसी भी रूप में फ़िट बैठते हैं । इन्हें याद रखना चाहिए कि एक बार मैनज्मेंट से मिल कर पैदा किया गया काल्पनिक भय अगर कर्मचारियों के दिल और दिमाग़ से निकल गया और उनमें चेतना और जागृति आ गई तो आसमान से धरती पर आने में देर नहीं लगेगी । इतिहास गवाह है कि घमण्ड विनाश का कारण बनता है ।
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